Monday, November 23, 2009

मेघदूत ..३६ से ४०

मेघदूत ..३६ से ४०


Hindi translation ..by Prof. C.B. Shrivastava" vidagdh"..JABALPUR

मूल संस्कृत
भर्तुः कण्ठच्चविर इति गणैः सादरं वीक्ष्यमाणः
पुण्यं यायास त्रिभुवनगुरोर धाम चण्डीश्वरस्य
धूतोद्यानं कुवलयरजोगन्धिभिर गन्धवत्यास
तोयक्रीडानिरतयुवतिस्नानतिक्तैर मरुद्भिः॥१.३६॥
हिन्दी पद्यानुवाद
वहां केशगंधी अगरु धूम्र से हृष्ट
पा गृहशिखी से मिलन नृत्य उपहार
सुमन गंधसज्जित चरमराग रंजित
भवन श्री निरख , भूल श्रम , मार्ग कर पार


मूल संस्कृत
अप्य अन्यस्मिञ जलधर महाकालम आसाद्य काले
स्थातव्यं ते नयनविषयं यावद अत्येति भानुः
कुर्वन सन्ध्यावलिपटहतां शूलिनः श्लाघनीयाम
आमन्द्राणां फलम अविकलं लप्स्यसे गर्जितानाम॥१.३७॥
हिन्दी पद्यानुवाद
स्वामी सदृश कंठ , छबिवान तुम
गण समावृत महाकाल के धाम जाना
नदी स्नान क्रीड़ा निरत युवतिजन की
कमल धूलि मिस्रित पवन गंध पाना


मूल संस्कृत
पादन्यासैः क्वणितरशनास तत्र लीलावधूतै
रत्नच्चायाखचितवलिभिश चामरैः क्लान्तहस्ताः
वेश्यास त्वत्तो नखपदसुखान प्राप्य वर्षाग्रबिन्दून
आमोक्ष्यन्ते त्वयि मधुकरश्रेणिदीर्घान कटक्षान॥१.३८॥
हिन्दी पद्यानुवाद
कहीं शाम के पूर्व जो मेघ पहुंचो
वहां सूर्य के अस्त तक विरम जाना
त्रिशूली महाकाल के सांध्यवंदन
समय गर्ज दुन्दुभि बजा पुण्य पाना


मूल संस्कृत
पश्चाद उच्चैर्भुजतरुवनं मण्डलेनाभ्लीनः
सांध्यं तेजः प्रतिनवजपापुष्परक्तं दधानः
नृत्तारम्भे हर पशुपतेर आर्द्रनागाजिनेच्चां
शान्तोद्वेगस्तिमितनयनं दृष्टभक्तिर भवान्या॥१.३९॥
हिन्दी पद्यानुवाद
वहां चरण निक्षेप से क्वणित रसना
जड़ित चँवरधारे , थके हाथ वाली
नखक्षत सुखद मेहकण पा लखेंगी
भ्रमर पंक्ति नयना तुम्हें देवदासी


मूल संस्कृत
गच्चन्तीनां रमाणवसतिं योषितां तत्र नक्तं
रुद्धालोके नरपतिपथे सूचिभेद्यैस तमोभिः
सौदामन्या कनकनिकषस्निग्धया दर्शयोर्वीं
तोयोत्सर्गस्तनितमुहरो मा च भूर्विक्लवास्ताः॥१.४०॥

हिन्दी पद्यानुवाद
फिर नृत्य में उठे भुजतरु शिखर लिप्त
हो , शंभु के धर जुही सांध्य लाली
हर गज अजिन आद्र परिधान इच्छा
लखें भक्ति , सस्मितवदन तव , भवानी

Friday, November 13, 2009

मेघदूत श्लोक ३१ से ३५

मेघदूत श्लोक ३१ से ३५

भावानुवादक ..प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध


प्राप्यावन्तीन उदयनकथाकोविदग्रामवृद्धान
पूर्वोद्दिष्टाम उपसर पुरीं श्रीविशालां विशालाम
स्वल्पीभूते सुचरितफले स्वर्गिणां गां गतानां
शेषैः पुण्यैर हृतम इव दिवः कान्तिमत खण्डम एकम॥१.३१॥

अवन्ती जहां वृद्धजन ग्राम वासी
कुशल हैं कथाकार उदयन कथा के
विशद पूर्व वर्णित पुरी , पूर्ण वैभव
परं रम्य विस्तीर्ण उज्जैन जा के
जिसे पुण्य के क्षीण होते स्वतः के
गये स्वर्गजन ने धरा पर उतारा
कि मानो बचे पुण्य को मोल देकर
लिया पा यहां स्वर्ग का खण्ड प्यारा


दीर्घीकुर्वन पटु मदकलं कूजितं सारसानां
प्रत्यूषेषु स्फुटितकमलामोदमैत्रीकषायः
यत्र स्त्रीणां हरति सुरतग्लानिम अङ्गानुकूलः
शिप्रावातः प्रियतम इव प्रार्थनाचाटुकारः॥१.३२॥

जहां सारसों का कलित नादवर्धक
सदा प्रात प्रमुदित कमल गंधवाही
कि शिप्रा समीरण सुखद, तरुणियों के
मिटाता सुरति खेद प्रिय सम सदा ही


हारांस तारांस तरलगुटिकान कोटिशः शङ्कशुक्तीः
शष्पश्यामान मरकतमणीन उन्मयूखप्ररोहान
दृष्ट्वा यस्यां विपणिरचितान विद्रुमाणां च भङ्गान
संलक्ष्यन्ते सलिलनिधयस तोयमात्रावशेषाः॥१.३३॥

जहां विपणि में हार अगणित अनेकों
सुखद शंख , सीपी , हरित मणि विनिर्मित
प्रभा पूर्ण मूंगों , तरल मोतियों से
भरेलख , जलधि भास होते प्रवंचित


प्रद्योतस्य प्रियदुहितरं वत्सराजो ऽत्र जह्रे
हैमं तालद्रुमवनम अभूद अत्र तस्यैव राज्ञः
अत्रोद्भ्रान्तः किल नलगिरिः स्तम्भम उत्पाट्य दर्पाद
इत्य आगन्तून रमयति जनो यत्र बन्धून अभिज्ञः॥१.३४॥

प्रद्योत की प्रिय सुता का , हरण
था यहां पर हुआ वत्स नरराज द्वारा
यहां ताल तरु का लगा बाग था
स्वर्ग निर्मित उसी भूप का , ख्यातिवाला
मदमस्त गजराज नलगिरि कभी
यहां भटका , यहां एक खम्भा उखाड़ा
आगत जनों को जहां विज्ञजन
यों सुनाते कथा , ले विगत का सहारा


जालोद्गीर्णैर उपचितवपुः केशसंस्कारधूपैर
बन्धुप्रीत्या भवनशिख्जिभिर दत्तनृत्योपहारः
हर्म्येष्व अस्याः कुसुमसुरभिष्व अधवखेदं नयेथा
लक्ष्मीं पश्यंल ललितवनितापादरागाङ्कितेषु॥१.३५॥

वहां सूर्य के अश्व सम नील हय हैं
जहां शैल सम उच्च गय मद प्रदर्शी
सुनिर्भीक रणवीर भट अग्रगामी
असिव्रण अलंकृत रुचिर रूपदर्शी



Saturday, October 24, 2009

श्लोक २६ से ३० ......अनुवादक प्रो सी. बी .स्रीवास्तव विदग्ध

श्लोक २६ से ३० ......अनुवादक प्रो सी. बी .स्रीवास्तव विदग्ध


नीचैराख्यं गिरिम अधिवसेस तत्र विश्रामहेतोस
त्वत्सम्पर्कात पुलकितम इव प्रौढपुष्पैः कदम्बैः
यः पुण्यस्त्रीरतिपरिमलोद्गारिभिर नागराणाम
उद्दामानि प्रथयति शिलावेश्मभिर यौवनानि॥१.२६॥

वहाँ "नीच" गिरिवास हो , पा तुम्हें जो
खिले नीप तरु से पुलक रोम हर्षित
जहाँ की गुफायें तरुण नागरों की
सुगणिका सुरति से सुगन्धित सुकर्षित



विश्रान्तः सन व्रज वननदीतीरजानां निषिञ्चन्न
उद्यानानां नवजलकणैर यूथिकाजाल्कानि
गण्डस्वेदापनयनरुजाक्लान्तकर्णोत्पलानां
चायादानात क्षणपरिचितः पुष्पलावीमुखानाम॥१.२७॥

वन नद पुलिन पर उगे यू्थिकोद्यान
को मित्र विश्रांत हो सींच जाना
दे छांह कुम्हले कमल कर्ण फूली
मलिन मालिनों को मिलन के बहाना



वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां
सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मा स्म भूर उज्जयिन्याः
विद्युद्दामस्फुरितचक्रितैस तत्र पौराङ्गनानां
लोलापाङ्गैर यदि न रमसे लोचनैर वञ्चितो ऽसि॥१.२८॥

यदपि वक्र पथ , हे पथिक उत्तरा के
न उज्जैन उत्संग तुम भूल जाना
विद्युत चकित चारु चंचल सुनयना
मिल रमणियों से मिलन लाभ पाना



वीचिक्षोभस्तनितविहगश्रेणिकाञ्चीगुणायाः
संसर्पन्त्याः स्खलितसुभगं दर्शितावर्तनाभः
निर्विन्ध्यायाः पथि भव रसाभ्यन्तरः संनिपत्य
स्त्रीणाम आद्यं प्रणयवचनं विभ्रमो हि प्रियेषु॥१.२९॥

विहग मेखला उर्मिताड़ित क्वणित नाभि
आवर्त लख मंदगति गामिनी के
हो एक रस , निर्विन्ध्या नदी मार्ग
में याद रख भावक्रम कामिनी के



वेणीभूतप्रतनुसलिला ताम अतीतस्य सिन्धुः
पाण्डुच्चाया तटरुहतरुभ्रंशिभिर्जीर्णपर्णैः
सौभाग्यं ते सुभग विरहावस्थया व्यञ्जयन्ती
कार्श्यं येन त्यजति विधिना स त्वयैवोपपाद्यः॥१.३०॥

वेणि सृदश क्षीण सलिला वराकी
सुतनु पीत जिसका पके पत्र दल से
विरह में तुम्हारे , सुहागिन तुम्हारी
तजे क्षीणता दो उसे पूर जल से

Sunday, October 18, 2009

श्लोक २१ ...२५

श्लोक २१ ...२५



नीपं दृष्ट्वा हरितकपिशं केसरैर अर्धरूढैर
आविर्भूतप्रथममुकुलाः कन्दलीश चानुकच्चम
जग्ध्वारण्येष्व अधिकसुरभिं गन्धम आघ्राय चोर्व्याः
सारङ्गास ते जललवमुचः सूचयिष्यन्ति मार्गम॥१.२१॥

वहां अर्ध मुकुलित हरित नीप तरु देख
कुसुमित कदलि भक्ष , पा गंध प्यारा
हाथी,हरिण,भ्रमर,चातक सभी मुग्ध
घन , पथ प्रदर्शन करेंगे तुम्हारा

अम्भोबिन्दुग्रहणचतुरांश चातकान वीक्षमाणाः
श्रेणीभूताः परिगणनया निर्दिशन्तो बलाकाः
त्वाम आसाद्य स्तनितसमये मानयिष्यन्ति सिद्धाः
सोत्कम्पानि प्रियसहचरीसंभ्रमालिङ्गितानि॥१.२२॥

होंगे ॠणी , सिद्धगण चिर तुम्हारे
कि नभ में पपीहा , बकुल शुभ्रमाला
निरखते सहज नाद सुन तव , भ्रमित भीत
कान्ता की पा नेहमय बाहुमाला


उत्पश्यामि द्रुतमपि सखे मत्प्रियार्थं यियासोः
कालक्षेपं ककुभसुरभौ पर्वते पर्वेते ते
शुक्लापाङ्गैः सजलनयनैः स्वागतीकृत्य केकाः
प्रतुद्यातः कथम अपि भवान गन्तुम आशु व्यवस्येत॥१.२३॥

कुटज पुष्पगंधी शिखर गिरि ,प्रखर हर
जो ममतोष हित आशु गतिवान तुमको
कही रोक ले तो सखे भूलना मत
रे सुन मोर स्वर ,पहुंचना जिस तरह हो



पाण्डुच्चायोपवनवृतयः केतकैः सूचिभिन्नैर
नीडारम्भैर गृहबलिभुजाम आकुलग्रामचैत्याः
त्वय्य आसन्ने परिणतफलश्यामजम्बूवनान्ताः
संपत्स्यन्ते कतिपयदिनस्थायिहंसा दशार्णाः॥१.२४॥

सुमन केतकी पीत शोभित सुखद कुंज
औ" आम्रतरु , काकदल नीड़वासी
लखोगे घिरे वन फलित जंबु तरु से
पहुंचते दशार्ण हंस अल्प प्रवासी

दशार्ण ... अर्थात वर्तमान मालवा मंदसौर क्षेत्र

तेषां दिक्षु प्रथितविदिशालक्षणां राजधानीं
गत्वा सद्यः फलम अविकलं कामुकत्वस्य लब्धा
तीरोपान्तस्तनितसुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात
सभ्रूभङ्गं मुखम इव पयो वेत्रवत्याश चलोर्मि॥१.२५॥

उसी ओर विदिशा बड़ी राजधानी
पहुंच भोग साधन सकल प्राप्त करके
अधरपान रस सम मधुर जल विमल पी
सुभग तटरवा बेतवा उर्मियों से

Sunday, October 11, 2009

मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद... by Prof. C.B. Shrivastava

मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद... by Prof. C.B. Shrivastava
16..to..20
त्वय्य आयन्तं कृषिफलम इति भ्रूविकारान अभिज्ञैः
प्रीतिस्निग्धैर्जनपदवधूलोचनैः पीयमानः
सद्यःसीरोत्कषणसुरभि क्षेत्रम आरुह्य मालं
किंचित पश्चाद व्रज लघुगतिर भूय एवोत्तरेण॥१.१६॥

कृषि के तुम्हीं प्राण हो इसलिये
नित निहारे गये कृषक नारी नयन से
कर्षित , सुवासिक धरा को सरस कर
तनिक बढ़ , उधर मुड़ विचरना गगन से


त्वाम आसारप्रशमितवनोपप्लवं साधु मूर्ध्ना
वक्ष्यत्य अध्वश्रमपरिगतं सानुमान आम्रकूटः
न क्षुद्रो ऽपि प्रथमसुकृतापेक्षया संश्रयाय
प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किं पुनर यस तत्थोच्चैः॥१.१७॥
दावाग्नि शामित सघन वृष्टि से तृप्त
थके तुम पथिक को , सुखद शीशधारी
वहां तंग गिरि आम्रकूट करेगा
परम मित्र , सब भांति सेवा तुम्हारी
संचित विगत पुण्य की प्रेरणावश
अधम भी अतिथि से विमुख न है होता
शरणाभिलाषी , सुहृद आगमन पर
जो फिर उच्च है , बात उनकी भला क्या ?


चन्नोपान्तः परिणतफलद्योतिभिः काननाम्रैस
त्वय्य आरूढे शिखरम अचलः स्निग्धवेणीसवर्णे
नूनं यास्यत्य अमरमिथुनप्रेक्षणीयाम अवस्थां
मध्ये श्यामः स्तन इव भुवः शेषविस्तारपाण्डुः॥१.१८॥
पके आम्रफल से लदे तरु सुशोभित
सघन आम्रकूटादि वन के शिखर पर
कवरि सदृश स्निग्ध गुम्फित अलक सी
सुकोमल सुखद श्याम शोभा प्रकट कर
कुच के सृदश गौर , मुख कृष्णवर्णी
लगेगा वह गिरि , परस पा तुम्हारा
औ" रमणीक दर्शन के हित योग्य होगा
अमरगण तथा अंगनाओ के द्वारा


स्थित्वा तस्मिन वनचरवधूभुक्तकुञ्जे मुहूर्तं
तोयोत्सर्गद्रुततरगतिस तत्परं वर्त्म तीर्णः
रेवां द्रक्ष्यस्य उपलविषमे विन्ध्यपादे विशीर्णां
भक्तिच्चेदैर इव विरचितां भूतिम अङ्गे गजस्य॥१.१९॥
जहां के लता कुंज हों आदिवासी
वधू वृंद के रम्य क्रीड़ा भवन हैं
वहां दान पर्जन्य का दे वनो को
विगत भार हो आशु उड़ते पवन में


{अध्वक्लान्तं प्रतिमुखगतं सानुमानाम्रकूटस
तुङ्गेन त्वां जलद शिरसा वक्ष्यति श्लाघमानः
आसारेण त्वम अपि शमयेस तस्य नैदाघम अग्निं
सद्भावार्द्रः फलति न चिरेणोपकारो महत्सु॥१.१९अ}॥
तनिक बढ़ विषम विन्ध्य प्रांचल प्रवाही
नदी नर्मदा कल कलिल गायिनी को
गजवपु उपरि गूढ़ गड़रों सरीखी
लखोगे वहां सहसधा वाहिनी को


तस्यास तिक्तैर वनगजमदैर वासितं वान्तवृष्टिर
जम्बूकुञ्जप्रतिहतरयं तोयम आदाय गच्चेः
अन्तःसारं घन तुलयितुं नानिलः शक्ष्यति त्वां
रिक्तः सर्वो भवति हि लघुः पूर्णता गौरवाय॥१.२०॥
जल रिक्त घन , वन्य गजमद सुवासित
सघन जम्बुवन रुद्ध रेवा सलिल को
पी हो अतुल , क्योकि पाते सभी रिक्त
लघुता तथा मान पा पूर्णता को

Sunday, September 13, 2009

११ से १५ ....अनुवाद द्वारा प्रो सी बी श्रीवास्तव

कर्तुं यच च प्रभवति महीम उच्चिलीन्ध्राम अवन्ध्यां
तच च्रुत्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्काः
आ कैलासाद बिसकिसलयच्चेदपाथेयवन्तः
संपत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसाः सहायाः॥१.११॥

सुन कर्ण प्रिय घोष यह प्रिय तुम्हारा
जो करता धरा को हरा , पुष्पशाली
कैलाश तक साथ देते उड़ेंगे
कमल नाल ले हंस मानस प्रवासी



आपृच्चस्व प्रियसखम अमुं तुङ्गम आलिङ्ग्य शैलं
वन्द्यैः पुंसां रघुपतिपदैर अङ्कितं मेखलासु
काले काले भवति भवतो यस्य संयोगम एत्य
स्नेहव्यक्तिश चिरविरहजं मुञ्चतो बाष्पमुष्णम॥१.१२॥

जगतवंद्य श्रीराम पदपद्म अंकित
उधर पूततट शैल उत्तुंग से मिल
जो वर्ष भर बाद पा फिर तुम्हें
विरह दुख से खड़ा स्नेहमय अश्रुआविल


मर्गं तावच चृणु कथयतस त्वत्प्रयाणानुरूपं
संदेशं मे तदनु जलद श्रोष्यसि श्रोत्रपेयम
खिन्नः खिन्नः शिहरिषु पदं न्यस्य गन्तासि यत्र
क्षीणः क्षीणः परिलघु पयः स्रोतसां चोपभुज्य॥१.१३॥

तो घन सुनो मार्ग पहले गमन योग्य
फिर वह संदेशा जो प्रिया को सुनाना
थके और प्यासे , प्रखर गिरि शिखर पर
जहां निर्झरों से तृषा है बुझाना

अद्रेः शृङ्गं हरति पवनः किं स्विद इत्य उन्मुखीभिर
दृष्टोत्साहश चकितचकितं मुग्धसिद्धाङ्गनाभिः
स्थानाद अस्मात सरसनिचुलाद उत्पतोदङ्मुखः खं
दिङ्नागानां पथि परिहरन स्थूलहस्तावलेपान॥१.१४॥

यहां से दिशा उत्तर प्रति उड़ो
इस तरह से कि लख तेज गति यह तुम्हारी
सिद्धांगनायें भी अज्ञान के वश
भ्रमित हों कि यह वायु गिरितुंगधारी


रत्नच्चायाव्यतिकर इव प्रेक्ष्यमेतत्पुरस्ताद
वल्मीकाग्रात प्रभवति धनुःखण्डम आखण्डलस्य
येन श्यामं वपुर अतितरां कान्तिम आपत्स्यते ते
बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णोः॥१.१५॥

यथा कृष्ण का श्याम वपु गोपवेशी
सुहाता मुकुट मोरपंखी प्रभा से
तथा रत्नछबि सम सतत शोभिनी
कान्ति पाओगे तुम इन्द्र धनु की विभा से

Saturday, September 12, 2009

श्लोक ६ से १०...द्वारा ..प्रो सी बी श्रीवास्तव

जातं वंशे भुवनविदिते पुष्करावर्तकानां
जानामि त्वां प्रकृतिपुरुषं कामरूपं मघोनः
तेनार्थित्वं त्वयि विधिवशाद दूरबन्धुर गतो ऽहं
याच्ञा मोघा वरम अधिगुणे नाधमे लब्धकामा॥१.६॥

कहा पुष्करावर्त के वंश में जात ,
सुरपति सुसेवक मनोवेशधारी
मैं दुर्भाग्यवश दूर प्रिय से पड़ा हूं
हो तुम श्रेष्ठ इससे है विनती हमारी
संतप्त जन के हे आश्रय प्रदाता
जलद! मम प्रिया को संदेशा पठाना
भली है गुणी से विफल याचना पर
बुरी नीच से कामना पूर्ति पाना



संतप्तानां त्वमसि शरणं तत पयोद प्रियायाः
संदेशं मे हर धनपतिक्रोधविश्लेषितस्य
गन्तव्या ते वसतिर अलका नाम यक्षेश्वराणां
बाह्योद्यानस्थितहरशिरश्चन्द्रिकाधौतहर्म्या॥१.७॥

मैं , धनपति के श्राप से दूर प्रिय से
है अलकावती नाम नगरी हमारी
यक्षेश्वरों की, विशद चंद्रिका धौत
प्रासाद , है बन्धु गम्या तुम्हारी


त्वाम आरूढं पवनपदवीम उद्गृहीतालकान्ताः
प्रेक्षिष्यन्ते पथिकवनिताः प्रत्ययाद आश्वसन्त्यः
कः संनद्धे विरहविधुरां त्वय्य उपेक्षेत जायां
न स्याद अन्यो ऽप्य अहम इव जनो यः पराधीनवृत्तिः॥१.८॥

गगन पंथ चारी , तिम्हें देख वनिता
स्वपति आगमन की लिये आश मन में
निहारेंगी फिर फिर ले विश्वास की सांस
अपने वदन से उठा रूक्ष अलकें
मुझ सम पराधीन जन के सिवा कौन
लखकर सघन घन उपस्थित गगन में
विरह दग्ध कान्ता की अवहेलना कब
करेगा कोई जन भला किस भवन में


त्वां चावश्यं दिवसगणनातत्पराम एकपत्नीम
अव्यापन्नाम अविहतगतिर द्रक्ष्यसि भ्रातृजायाम
आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्य अङ्गनानां
सद्यः पाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि॥१.९॥

अतिमंद अनुकूल शीतल पवन दोल
पर जब बढ़ोगे स्वपथ पर प्रवासी
तो वामांग में तब मधुर कूक स्वन से
सुमानी पपीहा हरेगा उदासी
आबद्ध माला उड़ेंगी बलाका
समय इष्ट लख गर्भ के हित , गगन में
करेंगी सुस्वागत तुम्हारा वहां पर
स्व अभिराम दर्शन दे भर मोद मन में


मन्दं मन्दं नुदति पवनश चानुकूलो यथा त्वां
वामश चायं नदति मधुरं चातकस ते सगन्धः
गर्भाधानक्षणपरिचयान नूनम आबद्धमालाः
सेविष्यन्ते नयनसुभगं खे भवन्तं बलाकाः॥१.१०॥

लखोगे सुनिश्चित विवश जीवशेषा
तो गिनते दिवस भ्रात की भामिनी को
आशा ही आधार , पति के विरह में
सुमन सम सुकोमल सुनारी हृदय को