सेकान्ते मुनिकन्याभिस्तत्क्षणोिज्झतवृक्षकम् ।
विÜवासाय विहंगानामालवालाम्बुपायिनाम् ।।
मुनिकन्यायें सींच तरू उन्हें गई झट त्याग
जिससे निर्भय हो विहंग पान करें जल भाग ।। 51।।
आतपात्ययसंक्षिप्तनीवारासु निषादिभि: ।
मृगैर्वर्तितरोमन्धमुटजा³गनभूमिषु ।।
रोमन्थन करते हनिण प्रांगण में मिल साथ
जहॉं दिन ढले अन्न को रहे समेट निषाद ।। 52।।
अभ्युित्थताग्निपिशुनैरतिथीनाश्रमोन्मुखान् ।
पुनानं पवनोद्धूतैधूZमैराहुतिगन्धिभि: ।।
आहूति गंधी पवन से धूम जहॉं गतिवान
अग्नि शिखा शुचि अतिथि ने आश्रम को पहचान ।। 53।।
अथ यन्तारमादिश्य धुर्यािन्वश्रामयेति स: ।
तामवरोहयत्पत्नीं रथादवततार च ।।
अश्वों को तब थामनें दे सारथि को हाथ
राजा रथ से उतर गये रानी को ले साथ ।। 54।।
तस्मै सभ्या: सभार्याय गोप्त्रे गुप्ततमेिन्द्रया: ।
अहZणामहZते चक्रुर्मुनयो नयचक्षुषे ।।
सपत्नीक उस न्यायी से , जो रक्षक विख्यात
सभी जितेिन्द्रय मुनियों ने की स्वागत कर बात ।। 55।।
विधे: सायंतनस्यान्ते स ददशZ तपोनिधिम् ।
अन्वासितमरून्धत्या स्वाहयेव हविभुZजम् ।।
अरून्धिती गुरू देव के सन्धया वन्दन बाद
दशZन पायें यों यथा स्वाहा - हविभुज साथ ।। 56।।
तयोर्जगृहतु: पादान्राजा राज्ञी च मागधी ।
तौ गुरूर्गुरूपत्नी च प्रीत्या प्रतिननन्दतु: ।।
राजा रानी ने किया उनको चरण प्रणाम
गुरू - गुरूपत्नो ने दिया आशीZवाद ललाम ।। 57।।
तमातिथ्यक्रियाशान्तरथक्षोभपरिश्रमम् ।
पप्रच्छ कुशलं राज्ये राज्याश्रममुनि मुनि: ।।
नुप से , पा आतिथ्य यो जिसकी मिटी थकान
मुनि ने पूंछी राज्य कुशल - क्षेम दे मान ।। 58।।
अथाथर्वनिधेस्तस्य विजितारिपुर: पुर: ।
अथ्र्यामर्थपतिर्वाचमाददे वद्तां वर: ।।
धर्म पंथ पालक नृप ‘शत्रु - विजेता ‘शूर
तब गुरू से बोले वचन आदर से भरपूर ।। 59।।
उपपन्नं ननु शिवं सप्तस्व³ेगषु यस्य मे ।
दैवीनां मानुषीणां च प्रतिहर्ता त्वमापदाम् ।।
गुरूवर है सब कुशलता प्रभुके पुण्य प्रताप
मुझ जिसके हर कष्ट के प्रतिहर्ता है आप ।। 60।।
Saturday, March 14, 2009
Sunday, March 1, 2009
महाकवि कालिदास के मूल संस्कृत रघुवंश के प्रथम सर्ग से श्लोक ४१ से ५० तक का प्रो. सी. बी श्रीवास्तव "विदग्ध" कृत हिन्दी श्लोकशः पद्यानुवाद ..संस्कृत श्
महाकवि कालिदास के मूल संस्कृत रघुवंश के प्रथम सर्ग से श्लोक ४१ से ५० तक का प्रो. सी. बी श्रीवास्तव "विदग्ध" कृत हिन्दी श्लोकशः पद्यानुवाद ..संस्कृत श्लोक सहित ...
श्रेणीबन्धाद्वितन्विभ्दरस्तम्भां तोरणस्त्रजम् ं
सारसै: कलनिहाZदै : ôचिदुन्नमिताननौ ।।
पंक्ति बद्ध बिखरी हुई तोरण सी अभिराम
सार के कल नाद सुन आनन उठा कलाम ।। 41।।
पवनस्यानुकूलत्वात्प्रार्थनासिद्धिशंसिन: !
रजोभिस्तुरगोत्कीण्ौरस्पृष्टालकवेष्टनौ ।।
अश्व खुरों की धूल से भरें अलक औं बाल
लखत पवन प्रवाह से काम सिद्धि तत्काल ।। 42।।
सरसीष्वरविन्दानां वीचिविक्षोभशीतलम् ।
आमोदमुपजिघ्रन्तौ स्वनि:Üवासानुकारिणम् ।।
वीचि विताहित जलज सी सर में व्याप्त सुवास
अपनी श्वासं सदृश मधुर पीकर शीतल वात ।। 43।।
ग्रामेष्वात्मविसृष्टेषु यूपचिन्हेषु यज्वनाम् ।
अमोघा: प्रतिगृह्रन्तावध्र्यानुपदमाशिष: ।।
यूप चिन्ह लख ग्राम में सकल मनोरथ जान
अध्र्य सहज स्वीकार कर सबको आशिष मान ।। 44।।
हैयंगवीनमादाय घोषवृद्धानुपस्थितान् ।
नामधेयानि पृच्छन्तौ वन्यानां मार्गशाखिनाम् ।।
ले नवनीत उपस्थित वयोवृद्ध गोपाल
से परिचय पा मार्ग का पूंंछ तॉंछ कर हाल ।। 45।।
काप्यभिख्या तयोरासीह्रजतो: शुद्धवेषयो : ।
हिमनिमुZक्तयोयोZगे चित्राचन्द्रमसोरिव ।।
चलते पथ शुचि वेश में होते थे यों भास
जैसे चित्रा - चन्द्र हों , शुचि निरभ्र आकाश ।। 46।।
तत्तभ्दूमिपति: पत्न्यै दशZयिन्प्रयदशZन: ।
अपि ल³घतमध्वानं बुबुधे न बुधोपम: ।।
दिखलाते पथ में मिले प्रिय को रम्य स्थान
सारा पथ यों कट गया , रहा न नृप को ध्यान ।। 47।।
स दुष्प्रापयशा: प्रापदाश्रमं श्रान्तवाहन: ।
सायं संयमिनस्तस्य महषेंZर्महिषीसख: ।।
कीर्तिमान भूपाल तब थकें हुये बेहाल
पहुंच रानी सहित , मुनि - आश्रम सायंकाल ।। 48।।
वनान्तरादृपावृतै: समित्कुशफलाहरै : ।
पूर्यमाणमट्टश्याग्निप्रत्युद्यातैस्तपस्विभि: ।।
समिधा कुश फल आदि ले लौटे वन से लोग
देखा ताप सवृंद का अग्नि प्रज्वलन योग ।। 49।।
आकीर्णमृषिपत्नीनामुटजद्वाररोधिभि: ।
अपत्यैरिव नीवारभागधेयोचितैमृZगै: ।।
उरज द्वार को रोककर मुनि पत्नी के पास
बाल मृगों को पुत्रवत चरते कोमल घास ।। 50।।
श्रेणीबन्धाद्वितन्विभ्दरस्तम्भां तोरणस्त्रजम् ं
सारसै: कलनिहाZदै : ôचिदुन्नमिताननौ ।।
पंक्ति बद्ध बिखरी हुई तोरण सी अभिराम
सार के कल नाद सुन आनन उठा कलाम ।। 41।।
पवनस्यानुकूलत्वात्प्रार्थनासिद्धिशंसिन: !
रजोभिस्तुरगोत्कीण्ौरस्पृष्टालकवेष्टनौ ।।
अश्व खुरों की धूल से भरें अलक औं बाल
लखत पवन प्रवाह से काम सिद्धि तत्काल ।। 42।।
सरसीष्वरविन्दानां वीचिविक्षोभशीतलम् ।
आमोदमुपजिघ्रन्तौ स्वनि:Üवासानुकारिणम् ।।
वीचि विताहित जलज सी सर में व्याप्त सुवास
अपनी श्वासं सदृश मधुर पीकर शीतल वात ।। 43।।
ग्रामेष्वात्मविसृष्टेषु यूपचिन्हेषु यज्वनाम् ।
अमोघा: प्रतिगृह्रन्तावध्र्यानुपदमाशिष: ।।
यूप चिन्ह लख ग्राम में सकल मनोरथ जान
अध्र्य सहज स्वीकार कर सबको आशिष मान ।। 44।।
हैयंगवीनमादाय घोषवृद्धानुपस्थितान् ।
नामधेयानि पृच्छन्तौ वन्यानां मार्गशाखिनाम् ।।
ले नवनीत उपस्थित वयोवृद्ध गोपाल
से परिचय पा मार्ग का पूंंछ तॉंछ कर हाल ।। 45।।
काप्यभिख्या तयोरासीह्रजतो: शुद्धवेषयो : ।
हिमनिमुZक्तयोयोZगे चित्राचन्द्रमसोरिव ।।
चलते पथ शुचि वेश में होते थे यों भास
जैसे चित्रा - चन्द्र हों , शुचि निरभ्र आकाश ।। 46।।
तत्तभ्दूमिपति: पत्न्यै दशZयिन्प्रयदशZन: ।
अपि ल³घतमध्वानं बुबुधे न बुधोपम: ।।
दिखलाते पथ में मिले प्रिय को रम्य स्थान
सारा पथ यों कट गया , रहा न नृप को ध्यान ।। 47।।
स दुष्प्रापयशा: प्रापदाश्रमं श्रान्तवाहन: ।
सायं संयमिनस्तस्य महषेंZर्महिषीसख: ।।
कीर्तिमान भूपाल तब थकें हुये बेहाल
पहुंच रानी सहित , मुनि - आश्रम सायंकाल ।। 48।।
वनान्तरादृपावृतै: समित्कुशफलाहरै : ।
पूर्यमाणमट्टश्याग्निप्रत्युद्यातैस्तपस्विभि: ।।
समिधा कुश फल आदि ले लौटे वन से लोग
देखा ताप सवृंद का अग्नि प्रज्वलन योग ।। 49।।
आकीर्णमृषिपत्नीनामुटजद्वाररोधिभि: ।
अपत्यैरिव नीवारभागधेयोचितैमृZगै: ।।
उरज द्वार को रोककर मुनि पत्नी के पास
बाल मृगों को पुत्रवत चरते कोमल घास ।। 50।।
Saturday, January 24, 2009
रघुवंश प्रथम सर्ग श्लोक ३१ से ४० .. pdyanuvadk प्रो सी बी श्रीवास्तव
तस्य दाक्षिण्यरूढेन नाम्ना मगधवंषजा ।
पत्नी सुदक्षिणेत्यासीदध्वरस्येव दक्षिणा ।।
उसकी पत्नी थी सरल , मगधवंष में जात
यथा यज्ञ की दक्षिणा , सुदक्षिणा विख्यात ।। 31।।
कलत्रवन्तमात्मानमवरोधे महत्यपि ।
तया मेने मनस्विन्या लक्ष्म्या च वसुधाधिपः ।।
अन्तःपुर का थ उसे पाकर के अभिमान
वसुधाधिप के हृदय में भी था अति सम्मान ।। 32।।
तस्यामात्मानुरूपायामात्जन्मसमुत्सुकः ।
विलम्बितफलै: कालं स निनाय मनोरथै: ।।
उससे आत्मज जन्म की मधुर कल्पना पाल
दीर्घ काल से साधरत रहते थे भूपाल ।। 33।।
संतानार्थाय विधये स्वभुजादवतारिता ।
तेन धूर्जगतो गुर्वी सचिवेषु निचिक्षिपे ।।
दे सचिवों को राज्य के संचालन का भार
पुत्र प्राप्ति की कामना से गुरूभार उतार ।। 34।।
अथाभ्यच्र्य विधातारं प्रयतौ पुत्रकाम्यया ।
तौ दंपती वसिष्ठस्य गुरोर्जग्मतुराश्रमम् ।।
ब्रह्म की कर अर्चना , रख मन में विष्वास
दोनो पति पत्नी गये गुरू वषिष्ठ के पास ।। 35।।
स्निगधगम्भीरनिर्घोषमेकं स्यन्दनर्मािस्थतौ ।
प्रावृषेण्यं पयोवाहं विद्युदैरावताविव ।।
विद्युत - ऐरावत यथा वर्षाधन आसीन
रथ में बैठे दम्पती तथा भाव तल्लीन ।। 36।।
मा भूदाश्रमपीडेति परिमेयपुरः सरौ ।
अनुभावविषेषातु सेनापरिवृताविव ।।
आश्रमपद की षांति का धरधर मन में ध्यान
सीमित परिजन और गुण थे जिनकी पहचान ।। 37।।
सेव्यमानौ सुखस्पषर् षालनिर्यासगनिधभिः ।
पुष्परेणूत्किरैर्वातैराधूतवनराजिभिः ।।
सालगंध युत वायु का पा कोमल संस्पर्ष
ले पराग जो बह रही वन श्री को दे हर्ष ।। 38।।
मनोभिरामाः ष्षृण्वन्तौ रथनेमिस्वनोन्मुखै: ।
षड्जसंवादिनीः केका द्विधा भिन्नाः षिखण्डिभि: ।।
रथ ध्वनि उत्सुक मोर की कूक - छलित आवाज
मन को आकर्षक लगी , लगें षडज् ज्यों साज ।। 39।।
परस्पराक्षिसाट्टष्यमदूरोज्झितवत्र्मसु ।
मृगद्वन्द्धेषु पष्यन्तौ स्पन्दनाबद्धट्टष्टिषु ।।
रथ समीप लग मार्ग तज रथ जो रहें निहार
मृग युग्मों के नयन सम , नयनों में भर प्यार ।। 40।।
पत्नी सुदक्षिणेत्यासीदध्वरस्येव दक्षिणा ।।
उसकी पत्नी थी सरल , मगधवंष में जात
यथा यज्ञ की दक्षिणा , सुदक्षिणा विख्यात ।। 31।।
कलत्रवन्तमात्मानमवरोधे महत्यपि ।
तया मेने मनस्विन्या लक्ष्म्या च वसुधाधिपः ।।
अन्तःपुर का थ उसे पाकर के अभिमान
वसुधाधिप के हृदय में भी था अति सम्मान ।। 32।।
तस्यामात्मानुरूपायामात्जन्मसमुत्सुकः ।
विलम्बितफलै: कालं स निनाय मनोरथै: ।।
उससे आत्मज जन्म की मधुर कल्पना पाल
दीर्घ काल से साधरत रहते थे भूपाल ।। 33।।
संतानार्थाय विधये स्वभुजादवतारिता ।
तेन धूर्जगतो गुर्वी सचिवेषु निचिक्षिपे ।।
दे सचिवों को राज्य के संचालन का भार
पुत्र प्राप्ति की कामना से गुरूभार उतार ।। 34।।
अथाभ्यच्र्य विधातारं प्रयतौ पुत्रकाम्यया ।
तौ दंपती वसिष्ठस्य गुरोर्जग्मतुराश्रमम् ।।
ब्रह्म की कर अर्चना , रख मन में विष्वास
दोनो पति पत्नी गये गुरू वषिष्ठ के पास ।। 35।।
स्निगधगम्भीरनिर्घोषमेकं स्यन्दनर्मािस्थतौ ।
प्रावृषेण्यं पयोवाहं विद्युदैरावताविव ।।
विद्युत - ऐरावत यथा वर्षाधन आसीन
रथ में बैठे दम्पती तथा भाव तल्लीन ।। 36।।
मा भूदाश्रमपीडेति परिमेयपुरः सरौ ।
अनुभावविषेषातु सेनापरिवृताविव ।।
आश्रमपद की षांति का धरधर मन में ध्यान
सीमित परिजन और गुण थे जिनकी पहचान ।। 37।।
सेव्यमानौ सुखस्पषर् षालनिर्यासगनिधभिः ।
पुष्परेणूत्किरैर्वातैराधूतवनराजिभिः ।।
सालगंध युत वायु का पा कोमल संस्पर्ष
ले पराग जो बह रही वन श्री को दे हर्ष ।। 38।।
मनोभिरामाः ष्षृण्वन्तौ रथनेमिस्वनोन्मुखै: ।
षड्जसंवादिनीः केका द्विधा भिन्नाः षिखण्डिभि: ।।
रथ ध्वनि उत्सुक मोर की कूक - छलित आवाज
मन को आकर्षक लगी , लगें षडज् ज्यों साज ।। 39।।
परस्पराक्षिसाट्टष्यमदूरोज्झितवत्र्मसु ।
मृगद्वन्द्धेषु पष्यन्तौ स्पन्दनाबद्धट्टष्टिषु ।।
रथ समीप लग मार्ग तज रथ जो रहें निहार
मृग युग्मों के नयन सम , नयनों में भर प्यार ।। 40।।
Thursday, January 22, 2009
रघुवंशम् ।श्लोक २१ से ३०
जुगोपात्मानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुर : ।
अगृध्रुराददे सो•र्थमसक्त: सुखमन्वभूत् ।।
सकल धर्म साधन सुलभ, स्वस्थ ‘शरीर प्रमाण
सुख - वैभव उपभेग भी किये क्षणिक सब मान ।। 21।।
ज्ञाने मौनं क्षमा ‘शक्तौ त्यागे Üळाघाविपर्यय: ।
गुणा गुणानुबन्धित्वात्तस्य सप्रसवा इव ।।
ज्ञान शक्ति औं त्याग के अनुवर्ती गुण आप्त
मौन क्षमा श्लाद्या विरति जन्मजात थे प्राप्त ।। 22।।
अनाकृष्टस्य विषयैर्विद्यानां पराट्टÜवन: ।
तस्य धर्मरमेरासीद्धृद्धत्वं जरसा बिना ।।
परांगत विद्यायों में , विषयों में रूचिहीन
वृद्धावस्था पूर्व ही धर्मकर्म में लीन ।। 23।।
प्रजानां विनयाधानाद्रक्षणाभ्दरणादपि ।
स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतव: ।।
शिक्षा पोषण भरण कर , प्रजा पुत्रवत पाल
पिता जन्म हि पिता थे , पालक थे भूपाल ।। 24।।
स्थित्यै दण्डयतो दण्डयान्परिणेतु: प्रसूतये ।
अप्यर्थकामौ तस्यास्तां धर्म एव मनीषिण: ।।
अपराधी हित दण्ड था , पुत्र प्राप्ति हित ब्याह
अर्थ - काम का भी किया , धर्म सदृश निर्वाह ।। 25।।
दुदोह गां स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम् ।
संपद्धिनिमयेनोभौ दधतुभुZवनद्धयम् ।।
यज्ञ हेतु भूलोक का , अन्न हेतु दिवलोग
दोहन राजा ने किया ले समुचित सहयोग ।। 26।।
न किलानुययुस्तस्य राजानो रक्षितुर्यश: ।
व्यावृता यत्परस्वेभ्य: श्रुतौ तस्करता स्थिता ।।
अन्य कोई नृप कर सका नहीं कीर्ति में मात
तस्करता केवल हुई सुनने भर की की बात ।। 27।।
द्वेष्यो•पि संमत: शिष्टस्तस्यार्तस्य यथौषधम् ।
त्याज्यो दुष्ट: प्रियो•प्यासीदगुंलीवोरगक्षता ।।
रोगी को ओषधि सदृश , शिष्ट शत्रु आराध्य
तथा सर्प विष सदृश थे , दुष्ट स्वजन भी त्याज्य ।।28।।
तं वेधा विदधे नूनं महाभूतसमाधिना ।
तथाहि सर्वे तस्यासन्पराथैZकफला गुणा : ।।
ब्रह्रा ने सिरजा उसे थ यों तत्व सहेज
गुण था परहित काज ही मानो एक विशेष ।। 29।।
स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम् ।
अनन्यशासनामुर्वी ‘शशासैकपूरीमिव ।।
सागर वेषिृत भूमि जहं शेष न था कोई भूप
एक नगर की भॉंति वहंं शासन किया अनूप ।। 30।।
अगृध्रुराददे सो•र्थमसक्त: सुखमन्वभूत् ।।
सकल धर्म साधन सुलभ, स्वस्थ ‘शरीर प्रमाण
सुख - वैभव उपभेग भी किये क्षणिक सब मान ।। 21।।
ज्ञाने मौनं क्षमा ‘शक्तौ त्यागे Üळाघाविपर्यय: ।
गुणा गुणानुबन्धित्वात्तस्य सप्रसवा इव ।।
ज्ञान शक्ति औं त्याग के अनुवर्ती गुण आप्त
मौन क्षमा श्लाद्या विरति जन्मजात थे प्राप्त ।। 22।।
अनाकृष्टस्य विषयैर्विद्यानां पराट्टÜवन: ।
तस्य धर्मरमेरासीद्धृद्धत्वं जरसा बिना ।।
परांगत विद्यायों में , विषयों में रूचिहीन
वृद्धावस्था पूर्व ही धर्मकर्म में लीन ।। 23।।
प्रजानां विनयाधानाद्रक्षणाभ्दरणादपि ।
स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतव: ।।
शिक्षा पोषण भरण कर , प्रजा पुत्रवत पाल
पिता जन्म हि पिता थे , पालक थे भूपाल ।। 24।।
स्थित्यै दण्डयतो दण्डयान्परिणेतु: प्रसूतये ।
अप्यर्थकामौ तस्यास्तां धर्म एव मनीषिण: ।।
अपराधी हित दण्ड था , पुत्र प्राप्ति हित ब्याह
अर्थ - काम का भी किया , धर्म सदृश निर्वाह ।। 25।।
दुदोह गां स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम् ।
संपद्धिनिमयेनोभौ दधतुभुZवनद्धयम् ।।
यज्ञ हेतु भूलोक का , अन्न हेतु दिवलोग
दोहन राजा ने किया ले समुचित सहयोग ।। 26।।
न किलानुययुस्तस्य राजानो रक्षितुर्यश: ।
व्यावृता यत्परस्वेभ्य: श्रुतौ तस्करता स्थिता ।।
अन्य कोई नृप कर सका नहीं कीर्ति में मात
तस्करता केवल हुई सुनने भर की की बात ।। 27।।
द्वेष्यो•पि संमत: शिष्टस्तस्यार्तस्य यथौषधम् ।
त्याज्यो दुष्ट: प्रियो•प्यासीदगुंलीवोरगक्षता ।।
रोगी को ओषधि सदृश , शिष्ट शत्रु आराध्य
तथा सर्प विष सदृश थे , दुष्ट स्वजन भी त्याज्य ।।28।।
तं वेधा विदधे नूनं महाभूतसमाधिना ।
तथाहि सर्वे तस्यासन्पराथैZकफला गुणा : ।।
ब्रह्रा ने सिरजा उसे थ यों तत्व सहेज
गुण था परहित काज ही मानो एक विशेष ।। 29।।
स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम् ।
अनन्यशासनामुर्वी ‘शशासैकपूरीमिव ।।
सागर वेषिृत भूमि जहं शेष न था कोई भूप
एक नगर की भॉंति वहंं शासन किया अनूप ।। 30।।
Wednesday, January 21, 2009
रघुवंशम् ।मूल श्लोक ११ से २० तक पद्यानुवाद सहित
वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् ।
आसीन्महीक्षितामाद्य: प्रणवश्छन्दसामिव ।।
वैवस्वत मनु नाम के ख्यात विशेष मनीष
वेदों में ओंकार सम प्रथम प्रबुद्ध महीष ।। 11।।
तदन्वये ‘शुद्धिमति प्रसूत: ‘शुद्धिमत्तर: ।
दिलीप इति राजेन्दुरिन्दु: क्षीरनिधाविव ।।
उनके पावन वंश में प्रबुध दिलीप नरेश
हुये, कि जैसे क्षीरनिधि से उपजे राकेश ।। 12।।
व्यूढोरस्को वृषस्कन्ध: शालप्रांशुर्महाभुज: ।
आत्मकर्मक्षमं देहं क्षात्रो धर्म इवाश्रित: ।।
उर विशाल , वृषकन्ध औं दीघZ सुवाहु सुरूप
सकल कर्म हित सबल तनु , छात्रधर्म धृतरूप ।। 13।।
सर्वातिरिक्तसारेण सर्वतेजोभिभाविना ।
स्थित: सर्वोन्नतेनोवाीZ क्रान्त्वा मेरुरिवात्मना ।।
शक्ति युक्त अति तेजमय , कान्तिवान , बलवान
पृथ्वी पर विख्यात बुध , पर्वत मेरूं समान ।। 14।।
आकारसट्टशप्रज्ञ: प्रज्ञया सट्टशागम: ।
आगमै: सट्टशारम्भ आरम्भसट्टशोदय: ।।
रूप सदृश प्रज्ञा लिये , प्रज्ञा सम रूप साथ
शास्त्रविहित शुभकर्म सं , कर्मसदृश फल हाथ ।। 15।।
भीमकान्तैनृेपगुण्ौ: स वभूवोपजीविनाम् ।
अधृष्यÜचाभिगम्यÜच यादोरत्नैनिवार्णव: ।।
योग्य नृपति के गुणों से आश्रित जनहित प्रेय
हुआ कि जलचर , रत्नहित ज्यों सागर है ध्येय ।। 16।।
रेखामात्रमपि क्षुण्णादा मनोर्वत्र्मन: परम् ।
न व्यतीयृ: प्रजास्तस्य नियन्तुनेZमिवृत्तय: ।।
पूर्व प्रतििष्ठत पंथ की प्रजा रही अनुयायि
कुशल सारथी का सुरथ ज्यों न लीक तज जाए ।। 17।।
प्रजानामेव भूत्यथंZ स ताभ्यो बलिमग्रहीत् ।
सहस्त्रगुणमुत्स्रष्ड्डमादत्ते हि रसं रवि: ।।
रवि किरणों से जिस तरह करता रस स्वीकार
विविध दान हित , प्रजाहित या उसका धर भार।।18।।
सेना परिच्छदस्तस्य द्वयमेवार्थसाधनम् ।
शास्त्रेष्वकृिण्ठता बुद्धिमौंर्वी धनुषि चातता ।।
उसकी सेना के रहे दो बल श्रेष्ठप्रधान
नीति युक्त शुभ बुद्धि और धनुष रज्जु की तान ।। 19।।
तस्य संवृतमन्त्रस्य गूढाकारेिग्³तस्य च ।
फलानुमेया: प्रारम्भा: संस्कारा : प्राक्तना इव ।।
उसके मन के भाव हों या हों गूढ़ विचार
पूर्व कर्म संस्कार युत थे , फल के अनुसार ।। 20।।
हिन्दी पद्यानुवादक
प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव `विदग्ध´
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
भारत
आसीन्महीक्षितामाद्य: प्रणवश्छन्दसामिव ।।
वैवस्वत मनु नाम के ख्यात विशेष मनीष
वेदों में ओंकार सम प्रथम प्रबुद्ध महीष ।। 11।।
तदन्वये ‘शुद्धिमति प्रसूत: ‘शुद्धिमत्तर: ।
दिलीप इति राजेन्दुरिन्दु: क्षीरनिधाविव ।।
उनके पावन वंश में प्रबुध दिलीप नरेश
हुये, कि जैसे क्षीरनिधि से उपजे राकेश ।। 12।।
व्यूढोरस्को वृषस्कन्ध: शालप्रांशुर्महाभुज: ।
आत्मकर्मक्षमं देहं क्षात्रो धर्म इवाश्रित: ।।
उर विशाल , वृषकन्ध औं दीघZ सुवाहु सुरूप
सकल कर्म हित सबल तनु , छात्रधर्म धृतरूप ।। 13।।
सर्वातिरिक्तसारेण सर्वतेजोभिभाविना ।
स्थित: सर्वोन्नतेनोवाीZ क्रान्त्वा मेरुरिवात्मना ।।
शक्ति युक्त अति तेजमय , कान्तिवान , बलवान
पृथ्वी पर विख्यात बुध , पर्वत मेरूं समान ।। 14।।
आकारसट्टशप्रज्ञ: प्रज्ञया सट्टशागम: ।
आगमै: सट्टशारम्भ आरम्भसट्टशोदय: ।।
रूप सदृश प्रज्ञा लिये , प्रज्ञा सम रूप साथ
शास्त्रविहित शुभकर्म सं , कर्मसदृश फल हाथ ।। 15।।
भीमकान्तैनृेपगुण्ौ: स वभूवोपजीविनाम् ।
अधृष्यÜचाभिगम्यÜच यादोरत्नैनिवार्णव: ।।
योग्य नृपति के गुणों से आश्रित जनहित प्रेय
हुआ कि जलचर , रत्नहित ज्यों सागर है ध्येय ।। 16।।
रेखामात्रमपि क्षुण्णादा मनोर्वत्र्मन: परम् ।
न व्यतीयृ: प्रजास्तस्य नियन्तुनेZमिवृत्तय: ।।
पूर्व प्रतििष्ठत पंथ की प्रजा रही अनुयायि
कुशल सारथी का सुरथ ज्यों न लीक तज जाए ।। 17।।
प्रजानामेव भूत्यथंZ स ताभ्यो बलिमग्रहीत् ।
सहस्त्रगुणमुत्स्रष्ड्डमादत्ते हि रसं रवि: ।।
रवि किरणों से जिस तरह करता रस स्वीकार
विविध दान हित , प्रजाहित या उसका धर भार।।18।।
सेना परिच्छदस्तस्य द्वयमेवार्थसाधनम् ।
शास्त्रेष्वकृिण्ठता बुद्धिमौंर्वी धनुषि चातता ।।
उसकी सेना के रहे दो बल श्रेष्ठप्रधान
नीति युक्त शुभ बुद्धि और धनुष रज्जु की तान ।। 19।।
तस्य संवृतमन्त्रस्य गूढाकारेिग्³तस्य च ।
फलानुमेया: प्रारम्भा: संस्कारा : प्राक्तना इव ।।
उसके मन के भाव हों या हों गूढ़ विचार
पूर्व कर्म संस्कार युत थे , फल के अनुसार ।। 20।।
हिन्दी पद्यानुवादक
प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव `विदग्ध´
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
भारत
Tuesday, January 20, 2009
।। कवि कुल गुरू महा कवि कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद ।।
महाकवि श्री कालिदास रचित
महाकवि श्री कालिदास रचित
रघुवंशम्
।। कवि कुल गुरू महा कवि कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद ।।
।। श्री : ।।
रघुवंशम् ।
हिन्दी पद्यानुवादक
प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव `विदग्ध´
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
भारत
: प्रधान कार्यालय :
: विकास प्रकाशन महिष्मति , मण्डला म. प्र. :
विवेक सदन नर्मदागंज मंडला म.प्र. 481661
फोन ०७६१२६६२०५२
: मुंबई कार्यालय :
बी. - 308 , साबरमती आपार्टमैन्ट्स , सहकार ग्राम
कांदीवली (पूर्व) मुंबई 400 001
सर्वाधिकार सुरक्षित
।। श्री : ।।
रघुवंशम् ।
संजीविन्या समेतम् ।
प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव `विदग्ध´
अनुवाद
भूतपूर्व प्राध्यापक प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय , जबलपुर म.प्र.
ई मेल : vivekranjan.vinamra@gmail.com
mob 09425484452
पुस्तक के रूप में प्रकाशक चाहिये .
लेखक से प्रकाशन अधिकार प्राप्त करने हेतु संपर्क करें .
ई मेल : vivekranjan.vinamra@gmail.com
mob 09425484452
सर्वाधिकार सुरक्षित
आमुख
महाकवि कालीदास एक चिर अनंत काल के कवि हैं । जिनकी भाषा प्राष्कृत परिमार्जित एवं जीवंत है । महाकवि कालीदास के अनेकानेक कार्यो का समय समय पर मूर्धन्य विद्वान अनेकानेक भारतीय भाषाओं में लोकहित में रूपांतरण करते आएं है । इसी श्रृंखला में यह वर्तमान प्रस्तुति जाने माने विद्वान प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध जी ने उम्र के एक बड़े पडाव पर आकर इसे पूर्ण करा है जो की अपने आप में उनकी साधना के ज्ञान एंव निचोड तथा ऊर्जाओं का एक अनूठा उदाहरण है । यह सदा सदा भारतवर्ष की एक अभिन्न सम्पत्ति रहेगी ।
मैं उम्मीद करता हूं की इस महान कार्य को भारत सरकार अपने हाथ में लेकर चार चॉद लगा देगी और साथ ही सरकार या प्रकाशक इसे देश विदेश की तमाम अनेक भाषाओं में अब तैयार करवा करके भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार हेतु कोई कसर नही छोड़ेगें ।
मैं प्रयत्नशील रहूंगा कि प्रतिदिन १० मूल संस्कृत श्लोको का हिन्दी पद्यानुवाद धारावाहिक रूप से क्मशः इस ब्लाग पर डालता जाउँ .
अंत में समस्त विद्वान पाठक जनो को
मेरी ओर से सादर सादर प्रणाम. आपकी प्रतिक्रियाओ की प्रतिक्षा रहेगी .
धन्यवाद
विवेक रंजन श्रीवास्तव
रघुवंश सर्ग 1
वागवर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगत: पितरौ वन्दे पार्वतीपरÜवरौ ।।
जग के माता - पिता जो , पार्वती - शिव नाम
शब्द - अर्थ सम एक जों , उनको विनत प्रणाम ।। 1 ।।
ô सूर्यप्रभवो वंश: ô चाल्पविषया मति: ।
तितिर्षZुर्दस्तरं मोहाìपेनािस्म सागरम् ।।
कहॉं सूर्य कुल का विभव , कहॉं अल्प मम ज्ञान
छोटी सी नौका लिये सागर - तरण समान ।। 2 ।।
मन्द: कवियश: प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् ।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्वाहुरिव वामन : ।।
मूढ़ कहा जाये न कवि , हो न कहीं उपहास
बौना जैसे भुज उठा धरे दूर फल आस ।। 3 ।।
अथवा कृतवाग्द्वारे वंशे•िस्मन्पूर्वसूरिभि : ।
मणौ वज्रसमुत्कीर्ण सूत्रस्येवास्ति मे गति: ।।
किन्तु पूर्व कवि से मिल े बेधित मणि सायास
एक सूत्र में गूंथने का है नम्र प्रयास ।। 4 ।।
सो•हमाजन्मशुद्धानामाफलोदयकर्मणाम् ।
आसमुद्रक्षितीशानामानाकरथवत्र्मनाम् ।।
जन्मजात संस्कार युत , सुफल हेतु कर्मेश
सागर तक फैली धरा के शासक सूयेZश ।। 5।।
यथा विधिहुताग्रीनां यथाकामार्चितार्थिनाम् ।
यथापराधदण्डानां यथाकालप्रबोधिनाम् ।।
देवापासक यथोचित याचक को दे दान
दुष्टों को जो दण्ड दें , समयोचित धर ध्यान ।। 6 ।।
त्यागाय संभृताथाZनां सत्याय मितभाषिणाम् ।
यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम् ।।
जिनका धन नित दान हितं , मितभाषी सद्धर्म
यशोकामना से विजय , प्रजा हेतु गृहकर्म ।। 7।।
‘
शैशवे•भ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैविषणाम् ।
वार्धके मृनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ।।
शैशव विद्याध्यास में , यौवन में अनुराग
वानप्रस्थ ढलती उमर , योगी हो तब त्याग ।। 8।।
रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवािग्वभवो•पि सन् ।
तहुण्ौ: कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदित: ।।
ऐसे रघुकुल नृपों का सुनकर सुयश महान
होकर उत्सुक , प्रेषित , करता हूंं गुणगान ।। 9।।
तं सन्त: श्रेातुमहZन्ति सदसद्वयक्तिहेतव: ।
हेम्न: संलक्ष्यते हाग्नौ विशुद्धि: श्यामिकापि वा ।।
गुण - अवगुण की परख खुद करें सुधी श्रीमान
सोने की गुण - दोष की अग्नि करे पहचान ।। 10।।
महाकवि श्री कालिदास रचित
रघुवंशम्
।। कवि कुल गुरू महा कवि कालिदास कृत रघुवंश महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद ।।
।। श्री : ।।
रघुवंशम् ।
हिन्दी पद्यानुवादक
प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव `विदग्ध´
सी ६ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
भारत
: प्रधान कार्यालय :
: विकास प्रकाशन महिष्मति , मण्डला म. प्र. :
विवेक सदन नर्मदागंज मंडला म.प्र. 481661
फोन ०७६१२६६२०५२
: मुंबई कार्यालय :
बी. - 308 , साबरमती आपार्टमैन्ट्स , सहकार ग्राम
कांदीवली (पूर्व) मुंबई 400 001
सर्वाधिकार सुरक्षित
।। श्री : ।।
रघुवंशम् ।
संजीविन्या समेतम् ।
प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव `विदग्ध´
अनुवाद
भूतपूर्व प्राध्यापक प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय , जबलपुर म.प्र.
ई मेल : vivekranjan.vinamra@gmail.com
mob 09425484452
पुस्तक के रूप में प्रकाशक चाहिये .
लेखक से प्रकाशन अधिकार प्राप्त करने हेतु संपर्क करें .
ई मेल : vivekranjan.vinamra@gmail.com
mob 09425484452
सर्वाधिकार सुरक्षित
आमुख
महाकवि कालीदास एक चिर अनंत काल के कवि हैं । जिनकी भाषा प्राष्कृत परिमार्जित एवं जीवंत है । महाकवि कालीदास के अनेकानेक कार्यो का समय समय पर मूर्धन्य विद्वान अनेकानेक भारतीय भाषाओं में लोकहित में रूपांतरण करते आएं है । इसी श्रृंखला में यह वर्तमान प्रस्तुति जाने माने विद्वान प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध जी ने उम्र के एक बड़े पडाव पर आकर इसे पूर्ण करा है जो की अपने आप में उनकी साधना के ज्ञान एंव निचोड तथा ऊर्जाओं का एक अनूठा उदाहरण है । यह सदा सदा भारतवर्ष की एक अभिन्न सम्पत्ति रहेगी ।
मैं उम्मीद करता हूं की इस महान कार्य को भारत सरकार अपने हाथ में लेकर चार चॉद लगा देगी और साथ ही सरकार या प्रकाशक इसे देश विदेश की तमाम अनेक भाषाओं में अब तैयार करवा करके भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार हेतु कोई कसर नही छोड़ेगें ।
मैं प्रयत्नशील रहूंगा कि प्रतिदिन १० मूल संस्कृत श्लोको का हिन्दी पद्यानुवाद धारावाहिक रूप से क्मशः इस ब्लाग पर डालता जाउँ .
अंत में समस्त विद्वान पाठक जनो को
मेरी ओर से सादर सादर प्रणाम. आपकी प्रतिक्रियाओ की प्रतिक्षा रहेगी .
धन्यवाद
विवेक रंजन श्रीवास्तव
रघुवंश सर्ग 1
वागवर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगत: पितरौ वन्दे पार्वतीपरÜवरौ ।।
जग के माता - पिता जो , पार्वती - शिव नाम
शब्द - अर्थ सम एक जों , उनको विनत प्रणाम ।। 1 ।।
ô सूर्यप्रभवो वंश: ô चाल्पविषया मति: ।
तितिर्षZुर्दस्तरं मोहाìपेनािस्म सागरम् ।।
कहॉं सूर्य कुल का विभव , कहॉं अल्प मम ज्ञान
छोटी सी नौका लिये सागर - तरण समान ।। 2 ।।
मन्द: कवियश: प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् ।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्वाहुरिव वामन : ।।
मूढ़ कहा जाये न कवि , हो न कहीं उपहास
बौना जैसे भुज उठा धरे दूर फल आस ।। 3 ।।
अथवा कृतवाग्द्वारे वंशे•िस्मन्पूर्वसूरिभि : ।
मणौ वज्रसमुत्कीर्ण सूत्रस्येवास्ति मे गति: ।।
किन्तु पूर्व कवि से मिल े बेधित मणि सायास
एक सूत्र में गूंथने का है नम्र प्रयास ।। 4 ।।
सो•हमाजन्मशुद्धानामाफलोदयकर्मणाम् ।
आसमुद्रक्षितीशानामानाकरथवत्र्मनाम् ।।
जन्मजात संस्कार युत , सुफल हेतु कर्मेश
सागर तक फैली धरा के शासक सूयेZश ।। 5।।
यथा विधिहुताग्रीनां यथाकामार्चितार्थिनाम् ।
यथापराधदण्डानां यथाकालप्रबोधिनाम् ।।
देवापासक यथोचित याचक को दे दान
दुष्टों को जो दण्ड दें , समयोचित धर ध्यान ।। 6 ।।
त्यागाय संभृताथाZनां सत्याय मितभाषिणाम् ।
यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम् ।।
जिनका धन नित दान हितं , मितभाषी सद्धर्म
यशोकामना से विजय , प्रजा हेतु गृहकर्म ।। 7।।
‘
शैशवे•भ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैविषणाम् ।
वार्धके मृनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ।।
शैशव विद्याध्यास में , यौवन में अनुराग
वानप्रस्थ ढलती उमर , योगी हो तब त्याग ।। 8।।
रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवािग्वभवो•पि सन् ।
तहुण्ौ: कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदित: ।।
ऐसे रघुकुल नृपों का सुनकर सुयश महान
होकर उत्सुक , प्रेषित , करता हूंं गुणगान ।। 9।।
तं सन्त: श्रेातुमहZन्ति सदसद्वयक्तिहेतव: ।
हेम्न: संलक्ष्यते हाग्नौ विशुद्धि: श्यामिकापि वा ।।
गुण - अवगुण की परख खुद करें सुधी श्रीमान
सोने की गुण - दोष की अग्नि करे पहचान ।। 10।।
Wednesday, November 28, 2007
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